विदित हो अभी कुछ दिनों पहले संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को लगभग सौ सीट जीतने का अवसर प्राप्त हुआ, वही भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई. राहुल गाँधी दो सीटों रायबरेली और वायनाड से भरी बहुमत से विजई हुए, उन्होंने वायनाड सीट छोड़ दी और प्रियंका गाँधी (Priyanka Gandhi Vadra)को वहां से कांग्रेस का उम्मीदवार चुना गया.
प्रियंका गाँधी (Priyanka Gandhi Vadra) की छवि एक तेजतर्रार नेता के रूप में है कहते है अटल विहारी वाजपेई की सरकार एक समय रिपीट होना तय माना जा रहा था लेकिन संगठन में प्रियंका ने कुछ ऐसी रणनीति बनाई की भाजपा एक जीता हुआ चुनाव हार गई और डॉक्टर मनमोहन सिंह जैसा कुशल प्रधानमंत्री देश को मिला.
प्रियंका गाँधी (Priyanka Gandhi Vadra) की लीडरशिप क्वालिटी और लोगो को जोड़ने की एक ये कहानी बताते हुए वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय ने कहा, ‘हम लोग तहसीन पूनावाला की शादी में थे. सामने से संबित पात्रा आ रहे थे. राहुल गांधी वही बैठे रहे, वे अपना फोन देख रहे थे. तभी प्रियंका गांधी ने अपनी बेटी को बुलाया, इधर आना जरा और कहा, ये वही अंकल हैं, जिनके बारे में तुम पूछ रही थी कि ये कौन हैं. इसके बाद संबित पात्रा इतने विनम्र हो गए कि पूरे हॉल को पता चल गया कि प्रियंका गांधी अपनी बेटी को संबित पात्रा से मिलवा रही थीं.
Priyanka Gandhi Vadra ने जम्मू में एक कहानी सुनाई। उन्होंने कहा कि आपको शायद पता नहीं होगा कि मेरी दादी इंदिरा जी की हत्या से 4-5 दिन पहले हम घर पर बैठे थे. मैं 12 साल की थी, राहुल 14 साल का था. अचानक दादी ने कहा मेरा कश्मीर जाने का मन है. मैं पतझड़ में गिरने वाले चिनार के पेड़ देखना चाहती हूं. वो हमें कश्मीर लेकर आईं. पहली बार वो मुझे खीर भवानी के मंदिर ले गईं, फिर हम दिल्ली आ गए और 3-4 दिन बाद उनकी हत्या कर दी गई और वो शहीद हो गईं और तब से मैं जब भी श्रीनगर जाती हूं, खीर भवानी जरूर जाती हूं और अपनी दादी को याद करती हूं.
आपको बता दें कि गांधी परिवार का दक्षिण भारत से चुनाव लड़ने का लंबा इतिहास है. शुरुआत पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने की थी जब उन्होंने 1978 में चिकमंगलूर से चुनाव जीता था. इसके बाद 1980 में मेडक से इंदिरा गांधी सांसद बनीं थी. आपातकाल के बाद रायबरेली सीट से जब इंदिरा गांधी का कमबैक करना मुश्किल लग रहा था उस वक्त कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट ने उनके राजनीतिक जीवन के लिए संजीवनी का काम किया. 1978 के उपचुनाव में उनके लिए एक सुरक्षित सीट तलाशी गई. ये सीट थी कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट. मौजूदा सांसद डीबी गौड़ा से सीट खाली करवाई गई, यहां इंदिरा के सामने चुनौती सीएम वीरेंद्र पाटिल से भिड़ने की थी.
कहा जाता है इस उपचुनाव के प्रचार के लिए इंदिरा गांधी खुद 17 से 18 घंटे तक प्रचार किया. चुनाव का नतीजा कांग्रेस के पक्ष में आया और इंदिरा गांधी ने 77 हजार वोटों से जीत हासिल की और उनके विपक्ष में खड़े 26 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी.
इंदिरा गाँधी के बाद सोनिया गांधी 1999 में कर्नाटक के बेल्लारी से सांसद बनीं. हालांकि बाद में उन्होंने ये सीट छोड़ दी थी. राहुल गांधी 2019 और 2024 में केरल की वायनाड सीट से सांसद बने और अब प्रियंका गांधी वायनाड से चुनावी सियासत में एंट्री कर रही हैं. राहुल के रायबरेली सीट रखने और प्रियंका को वायनाड से चुनाव लड़ाने का फैसला कांग्रेस के लिए बड़ा फैसला है क्योंकि प्रियंका का एक ओर चुनावी डेब्यू हो रहा है. दूसरा अगर वो चुनाव जीत जाती हैं तो दोनों भाई बहन पहली बार संसद में मिलकर बीजेपी का मुकाबला करेंगे. प्रियंका लंबे समय से राजनीति में सक्रिय तो हैं लेकिन चुनावी राजनीति में पहली बार कदम बढ़ा रही हैं. अब तक वो मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी की चुनाव लड़ने में मदद करते आई हैं. इसके साथ उनके वायनाड से जीतने पर कांग्रेस उत्तर और दक्षिण भारत के बीच अच्छा बैलेंस भी बना सकती है.
राहुल गांधी ने कहा कि वायनाड और रायबरेली में से किसी एक को चुनना उनके लिए आसान नहीं था. उन्होंने रायबरेली को चुना है लेकिन वो वायनाड को भूलेंगे नहीं. राहुल के साथ प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi Vadra) ने भी कहा कि रायबरेली और वायनाड के लोगों की सेवा अब दोनों भाई-बहन मिलकर करेंगे. कांग्रेस दरअसल राहुल के रायबरेली सीट रखने के साथ आगे की रणनीति पर काम कर रही है. रायबरेली सीट गांधी परिवार की परंपरागत सीट है. इस सीट पर राहुल के दादा फिरोज गांधी, दादी इंदिरा गांधी और मां सोनिया गांधी चुनाव लड़ चुकी हैं. यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि राहुल गांधी के रायबरेली सीट रखने से यूपी में कांग्रेस मजबूत होगी. 2027 के विधानसभा चुनाव समेत आगे कांग्रेस और इंडिया गठबंधन अच्छा मुकाबला करेगी.




























































