New India की नई अर्थव्यवस्था की चमक-दमक के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. मोबाइल ऐप पर दिखने वाली “10 मिनट में डिलीवरी” की सुविधा उपभोक्ताओं को भले ही आकर्षक लगे, लेकिन इस सुविधा की कीमत देश के लाखों Gig Workers अपनी ज़िंदगी और सुरक्षा से चुका रहे हैं. ये वही युवा हैं जो बाइक पर, बारिश-धूप में, जान जोखिम में डालकर शहरों को “स्मार्ट” बनाने का बोझ ढो रहे हैं—बिना किसी स्थायी आमदनी, बिना बीमा और बिना सामाजिक सुरक्षा के.
आज Gig Economy को भविष्य की अर्थव्यवस्था बताया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भविष्य मज़दूरों के लिए सुरक्षित है? फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स, कैब और क्विक कॉमर्स से जुड़े श्रमिक तकनीकी रूप से “कर्मचारी” (Gig Workers) नहीं माने जाते. कंपनियां उन्हें “पार्टनर” या “फ्रीलांसर” कहकर अपने दायित्वों से पल्ला झाड़ लेती हैं. न न्यूनतम वेतन की गारंटी, न काम के घंटे तय, न बीमारी में छुट्टी, और न ही दुर्घटना होने पर पर्याप्त मुआवज़ा.
दस मिनट में डिलीवरी का दबाव इन Gig Workers को तेज़ रफ्तार में चलने, ट्रैफिक नियम तोड़ने और अपनी जान जोखिम में डालने को मजबूर करता है. आए दिन सड़क दुर्घटनाओं में इन युवाओं की मौत या स्थायी चोट की खबरें आती हैं, लेकिन सिस्टम खामोश रहता है। सवाल उठता है—क्या उपभोक्ता की सुविधा श्रमिक की जान से ज़्यादा कीमती है?
इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस नेता राहुल गांधी Gig Workers की आवाज़ बनकर सामने आए हैं. उन्होंने लगातार यह मुद्दा उठाया है कि नई अर्थव्यवस्था के साथ-साथ नए श्रम अधिकार भी सुनिश्चित किए जाने चाहिए. राहुल गांधी का स्पष्ट कहना है कि जो लोग देश की अर्थव्यवस्था को अपने पसीने से चला रहे हैं, उन्हें “अदृश्य मज़दूर” नहीं माना जा सकता. उन्हें सामाजिक सुरक्षा, बीमा, न्यूनतम आय और सम्मानजनक कार्य-स्थितियां मिलनी ही चाहिए.
राहुल गांधी ने कई मंचों से यह मांग रखी है कि Gig Workers को कानूनी पहचान दी जाए. उनके लिए हेल्थ इंश्योरेंस, एक्सीडेंट इंश्योरेंस और पेंशन जैसी बुनियादी सुविधाएं अनिवार्य की जाएं. उनका यह भी कहना है कि तकनीक इंसान के लिए होनी चाहिए, इंसान तकनीक के लिए नहीं. अगर एल्गोरिदम तय करेगा कि कौन कितना काम करेगा और कितनी कमाई होगी, तो सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह मज़दूर के हितों की रक्षा करे.
भारत का असंगठित क्षेत्र पहले से ही देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है. मनरेगा से लेकर दिहाड़ी मज़दूर तक, हमेशा यही वर्ग संकट में सबसे पहले पिसता है. Gig Workers इसी असंगठित क्षेत्र का नया चेहरा हैं—डिजिटल लेकिन असुरक्षित. अगर आज इनके अधिकारों पर बात नहीं हुई, तो आने वाले समय में यह संकट और गहराएगा.
राहुल गांधी की पहल इस मायने में अहम है कि वे Gig Workers के संघर्ष को सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के सवाल के रूप में देखते हैं. यह बहस सिर्फ डिलीवरी टाइम की नहीं, बल्कि उस युवा की ज़िंदगी की है जो हर ऑर्डर के साथ अपनी सुरक्षा दांव पर लगाता है.
आज ज़रूरत है कि देश इस मुद्दे पर गंभीर बहस करे. सरकार, कंपनियां और समाज—तीनों को मिलकर यह तय करना होगा कि विकास का रास्ता शोषण से होकर नहीं जाएगा. अगर भारत को सच में आत्मनिर्भर और न्यायपूर्ण बनाना है, तो Gig Workers को हक़, सुरक्षा और सम्मान देना होगा.
Gig Workers की इस लड़ाई में, फिलहाल, राहुल गांधी उनकी सबसे मुखर आवाज़ बनकर उभरते दिख रहे हैं.





























































