Ghulam Nabi Azad
Big disclosure: - Ghulam Nabi Azad was doing the same thing inside?

करीब 2 सालों की नाराजगी और समय-समय पर दिए जा रहे मीडिया इंटरव्यू के जरिए कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के बाद गुलाम नबी आजाद (Ghulam Nabi Azad) ने आखिरकार कांग्रेस को अलविदा कह दिया. गुलाम नबी आजाद  का पार्टी छोड़ना बिल्कुल भी हैरान नहीं करता है, लेकिन जो भाषा सोनिया गांधी को लिखे 5 पन्नों के इस्तीफे में उन्होंने इस्तेमाल की है वह जरूर हैरान करती है.

अपने पत्र में गुलाम नबी आजाद (Ghulam Nabi Azad) ने राहुल गांधी के व्यक्तित्व और नेतृत्व को निशाने पर लिया. इसके अलावा इस्तीफे के बाद कई मीडिया इंटरव्यू में राहुल गांधी पर व्यक्तिगत हमले किए, उनकी विदेश यात्राओं को लेकर टिप्पणियां की.

15 फरवरी 2021 के दिन गुलाम नबी आजाद (Ghulam Nabi Azad) के राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हुआ. विदाई कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से भावुक भाषण दिया गया. उनके आंसू छलक पड़े. उन्होंने कश्मीर में हुए धमाके को याद करते हुए मुख्यमंत्री रहते हुए गुलाम नबी आजाद की शानदार भूमिका को लेकर जमकर तारीफ की.

सितंबर 2021 में महाराष्ट्र राज्य सभा के लिए 7 सीटों पर चुनाव होने थे, जिसमें कांग्रेस के हिस्से में 2 सीट आनी थी. गुलाम नबी को कैंडिडेट बनाए जाने की उम्मीद थी, लेकिन कांग्रेस ने उनकी जगह जम्मू-कश्मीर की प्रभारी रजनी पाटिल को टिकट दे दिया.

गुलाम नबी आजाद कई वजहों से नाराज थे और उन्होंने इस्तीफा दे दिया. लेकिन प्रमुख वजह राजनीतिक जानकारों की नजर में घाटी में होने वाले विधानसभा चुनाव को बताया जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बात की मजबूत संभावना है कि जम्मू-कश्मीर में गुलाम नबी आजाद नई पार्टी बनाएंगे. ऐसा उन्होंने अपने कुछ इंटरव्यू में भी कहा है और अधिकतर लोगों का मानना है कि इन सब के पीछे बीजेपी है.

बीजेपी को लग रहा है कि जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने के लिए घाटी में उसे एक ऐसे साथी की जरूरत है. ऐसा साथी जो दिखने में बीजेपी से अलग हो, लेकिन अंदर से उनके साथ हो. बीजेपी के इस सपने को गुलाम नबी आजाद ही पूरा करते हुए दिखाई दे रहे हैं.

कई राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि पिछले साल भर में गुलाम नबी आजाद जम्मू कश्मीर में करीब 100 से ज्यादा रैली कर चुके हैं. ऐसे में साफ है कि वह घाटी की राजनीति में एंट्री करने वाले हैं. आजाद की पार्टी कश्मीर में 10 या उससे ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब होती है तो इससे बीजेपी की मदद से सरकार भी बन सकती है. प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले आजाद की पार्टी शायद बीजेपी से किसी तरह का गठबंधन ना करे, लेकिन चुनाव के बाद ऐसा हो सकता है. घाटी के लोग नए विकल्प की तलाश में है.

ऐसे में पुराने नेता होने और कश्मीरियत की बात करने की वजह से आजाद की पार्टी को लाभ मिल सकता है. 5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 और आर्टिकल 35a को खत्म कर दिया इसके बाद महबूबा मुफ्ती उमर अब्दुल्ला फारुख अब्दुल्ला सहित सभी बड़े नेताओं को हिरासत में लेकर नजरबंद किया गया था लेकिन गुलाम नबी आजाद उस वक्त भी आजाद थे. अगर घाटी की जनता के दिमाग में यह बात आती है कि आजाद चुनावों के बाद बीजेपी से हाथ मिला लेंगे, वहीं बीजेपी जिस ने धारा 370 को हटाया, घाटी के लोगों को कैद किया, तो क्या आजाद को समर्थन मिलेगा?

आपको बता दें कि मूल रूप से कश्मीर के डोडा जिले से आने वाले गुलाम नबी आजाद (Ghulam Nabi Azad) का कोई ठोस राजनीतिक जनाधार नहीं रहा है. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में सिर्फ चार बार चुनाव जीते हैं. 1980 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में जब देश भर में कांग्रेस की लहर थी तब उन्होंने महाराष्ट्र के वाशिम से लोकसभा चुनाव जीता. इसके बाद 1984 में वह आठवीं लोकसभा के लिए महाराष्ट्र से ही चुने गए. 2006 में आजाद ने जम्मू-कश्मीर की भादरवा सीट से उपचुनाव जीत और फिर 2008 में यही से दोबारा विधायक चुने गए. 2014 में उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा और हार गए.

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